भारतीय समाज में गोत्र की अवधारणा: एक अध्ययन

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

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A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 3 (March 2026)

DOI: 10.70558/SPIJSH

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Article Title

भारतीय समाज में गोत्र की अवधारणा: एक अध्ययन

Author(s) सोमचंद, डॉ. गिरीश गौरव.
Country India
Abstract

भारतीय समाज और संस्कृति मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहरों में से एक है। यदि विश्व की किसी संस्कृति को दीर्घकालिक, जीवंत और निरंतर विकसित होने वाली संस्कृति कहा जा सकता है, तो वह निस्संदेह भारतीय संस्कृति है। अपनी प्राचीनता, विविधता तथा ज्ञानपरक परंपराओं के कारण भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्षों से समाज के संगठन और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखा है। भारत के दीर्घ इतिहास में यहाँ के लोगों ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का निर्माण किया है, जो अपनी मौलिकता और विशिष्टता के कारण विश्व की अन्य सभ्यताओं से भिन्न दिखाई देती हैं। भारतीय संस्कृति की विशेषता यह रही है कि इसमें ज्ञान और आध्यात्मिकता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा मूलतः ज्ञानपरक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रेरित रही है, न कि केवल भौतिकवादी दृष्टि से। विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में अनेक प्रकार की मान्यताएँ और व्याख्याएँ मिलती हैं, किन्तु भारतीय परंपरा में इस विषय को विशेष रूप से ऋषियों के ज्ञान से जोड़ा गया है। भारतीय वैदिक परंपरा के अनुसार सृष्टि के ज्ञान और उसके रहस्यों को सर्वप्रथम ऋषियों ने ही अनुभूत किया। आकाश में स्थित तारामंडलों के संदर्भ में भी भारतीय परंपरा में ध्रुव तारे तथा सप्तऋषि मंडल का उल्लेख मिलता है। यह प्रतीकात्मक रूप से इस विश्वास को व्यक्त करता है कि ऋषि केवल आध्यात्मिक ज्ञान के स्रोत ही नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के प्रवर्तक भी थे। वेदों के रचयिता के रूप में भी ऋषियों का उल्लेख किया जाता है, किन्तु भारतीय दार्शनिक परंपरा में उन्हें ‘मंत्रद्रष्टा’ कहा गया है, अर्थात वेदों के मंत्र उनके द्वारा रचे नहीं गए, बल्कि उनकी अंतःप्रज्ञा में प्रकट हुए। भारतीय समाज में यह मान्यता भी प्रचलित है कि जिन ऋषियों ने ज्ञान की परंपरा को प्रकाशित किया, उन्हीं से विभिन्न वंशों की उत्पत्ति भी मानी जाती है। इन वंश प्रवर्तक ऋषियों को ही गोत्र प्रवर्तक कहा जाता है। इस प्रकार गोत्र की अवधारणा भारतीय समाज में वंश परंपरा, सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता से गहराई से जुड़ी हुई है। भारतीय धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न गोत्र प्रवर्तक ऋषियों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिनके आधार पर भारतीय समाज की वंश परंपराओं को समझा जा सकता है।

Area Sociology
Issue Volume 3, Issue 3 (March 2026)
Published 2026/03/18
How to Cite ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(3), 195-201.

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