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ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Papers - Volume 3, Issue 9 (September 2026)
Paper Title

निर्वचन की प्रकिया और यास्क

Author(s)Dr. Suhasini.
CountryIndia
Abstract

यास्क का निर्वचन विषयक ग्रन्थ भारतीय शास्त्रीय परम्परा में ऋग्वैदिक काल से विद्यमान निर्वचन की शैली के बीज का पूर्ण पल्लवन है। प्रस्तुत शोधपत्र में यास्क के पूर्ववर्ती निर्वचन की परम्परा के कालक्रमिक इतिहास पर परिचर्चा पूर्वक यास्क के ‘निरुक्त’ में उसके पूर्ण विकास को प्रदर्शित करते हुये आचार्य यास्क के निर्वचन विषयक सिद्धान्तों पर उदाहारण पूर्वक विस्तृत चर्चा की गयी हैं। ‘निर्वचन’ शब्द का शब्दशास्त्र के पारिभाषिक अर्थ में सर्वप्रथम देवताध्याय ब्राह्मण में उल्लेख है। इससे पूर्व अथर्ववेद (९.८.१०) में निरवोचम् तथा याजुष काठक (६.५), मैत्रायणी संहिता (१.११.९), शाङ्खायन (८.३) आदि प्राचीन ब्राह्मणों में ‘निरुक्त’ शब्द का प्रयोग अपने यौगिक अर्थ में हुआ है उपनिष। वैदिक वाङ्मय मे निर्वचन शब्द का प्रयोग शब्द के विश्लेषण करने वाले शास्त्र के अर्थ में भले न हुआ हो किन्तु ऋग्वेद के मन्त्रों में ही हमें अनेकानेक शब्दों का निर्वचन तथा व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण प्राप्त होने लगता है। ऋग्वेद के बाद अथर्ववेद संहिता में निर्वचन की शैली में कुछ विकास हुआ है। अथर्ववेद में क्रिया को नाम के हेतु के रूप में स्पष्ट रूप से कहा गया है, जबकि ऋग्वेद में शब्द के साथ धातु रख देने मात्र से निर्वचन मान लिया जाता है। निर्वचन की तकनीक ब्राह्मण ग्रन्थों में पूर्णविकसित हो चुकी थी। ब्राह्मण ग्रन्थों के दश लक्षणों में से एक निर्वचन भी है। उपनिषद् तथा पुराण ग्रन्थ यत्र तत्र व्याख्यान में निर्वचन का आश्रय लेते हैं। इसी निर्वचन की शैली का पूर्ण विकास यास्क के निरुक्त में दिखता है। यास्क द्वारा प्रदर्शित इस निर्वचन शैली का भारतीय वाङ्मय में विधेय शास्त्र के पारिभाषिक शब्दों के व्याख्यान के लिये एक तकनीक के रूप में प्रयोग प्रत्येक शास्त्र में हुआ है।

Subject AreaSanskrit
Issue Volume 3, Issue 5 (May 2026)
Published2026/05/08
How to Cite Suhasini (2026). निर्वचन की प्रकिया और यास्क. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(5), 65–75. https://doi.org/10.70558/spijsh.2026.v3.i5.45725
DOI 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i5.45725
License
Copyright © 2026 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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