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ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Papers - Volume 3, Issue 9 (September 2026)
Paper Title

संताली वाचिक साहित्य में सांस्कृतिक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति: आदिम वाचिक परंपरा के संदर्भ में

Author(s)राज मोहन बास्की, डॉ. प्रीति राय.
CountryIndia
Abstract

संताली भाषा भारत की प्रमुख आदिवासी भाषाओं में से एक है, जो अपनी सजातीय भाषाओं में सर्वाधिक प्रगतिशील और समृद्ध मानी जाती है। यह भाषा न केवल संप्रेषण का माध्यम रही है, बल्कि इसने एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा को भी जन्म दिया है, जिसे संताली समाज ने सदियों से वाचिक रूप में संरक्षित और संवर्धित किया है। संताली भाषा की विशेषता यह है कि इसने अपने साहित्य को लिपिबद्ध किए बिना भी पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखा, जिससे इसकी मौलिकता और सांस्कृतिक आत्मा अक्षुण्ण बनी रही। संताली वाचिक साहित्य में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तत्वों की भरमार है। यह साहित्य न केवल मनोरंजन का साधन रहा है, बल्कि यह ज्ञान, परंपरा, विश्वास और सामाजिक मूल्यों को स्थानांतरित करने का माध्यम भी रहा है। यहाँ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनृत्यों में जीवंतता और पर्व-त्योहारों की आस्था का समावेश है। इन सभी अभिव्यक्तियों के माध्यम से संतालों की सामूहिक स्मृति, उनकी जीवन शैली, संघर्ष, उल्लास और प्रकृति के प्रति उनका गहरा संबंध सामने आता है। आज जब वैश्वीकरण और आधुनिकता के प्रभाव से कई पारंपरिक भाषाएँ और सांस्कृतिक विरासतें खतरे में हैं, तब संताली भाषा की यह जीवंतता और साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा एक प्रेरणा स्वरूप है। इसे संरक्षित और बढ़ावा देना न केवल एक भाषा को बचाने का कार्य है, बल्कि इससे जुड़ी एक पूरी सभ्यता और जीवनदर्शन को भी जीवित रखने का प्रयास है।

Keywords‘वाचिक साहित्य’, ‘वाचिक परंपरा’, ‘वाचिकता’, ‘मौखिक परंपरा’, ‘संताली वाचिक साहित्य’, ‘आदिम’, ‘आदिम संस्कृति’, ‘आदिम वाचिक परंपरा’, ‘संस्कृति’, ‘संताली संस्कृति’।
Subject AreaLiterature
Issue Volume 3, Issue 6 (June 2026)
Published2026/06/30
How to Cite राज मोहन बास्की एवं प्रीति राय (2026). संताली वाचिक साहित्य में सांस्कृतिक ऐतिहासिक अभिव्यक्ति: आदिम वाचिक परंपरा के संदर्भ में. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(6), 308–318. https://doi.org/10.70558/spijsh.2026.v3.i6.45813
DOI 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i6.45813
License
Copyright © 2026 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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