| Paper Title | ‘धूमिल’ और गोरख पाण्डेय के काव्य में नक्सलबाड़ी आंदोलन की गूँज: एक अनुशीलन |
| Author(s) | दुर्गेश पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी. |
| Country | India |
| Abstract | वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से इलाके ‘नक्सलबाड़ी’ से भड़की किसानों और आदिवासियों के विद्रोह के स्वर की चिंगारी केवल एक भू-भागीय राजनैतिक घटना नहीं थी,बल्कि उसने पूरे देश के बौद्धिक वर्ग,सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को झकझोर कर रख दिया था।अंग्रेजी हुकूमत से वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के बाद देश ने जिस ‘समाजवाद’,जनतान्त्रिक मूल्यों और कल्याणकारी राज्य की कल्पना की थी,वह तो दो दशकों में ही दम तोड़ने लगी थी।गरीबी,भ्रष्टाचार,दमनकारी नीतियों,जमींदारी शोषण,नौकरशाही का अमानवीय चेहरा और मोहभंग की इसी पृष्ठभूमि से नक्सलबाड़ी का सशस्त्र व तीव्र प्रतिरोध सामने आया।हिन्दी साहित्य में इस राजनैतिक उथल-पुथल ने ‘समकालीन कविता’ या ‘नक्सलबाड़ी कविता’ के एक नए युग का सूत्रपात किया।इस दौर की कविता रोमानी भावुकता,कलावादी सौंदर्यशास्त्र और कूट-संकेतों(मिथकों) से मुक्त होकर सीधे गाँव,सड़क,खेत-खलिहानों से होते हुए सीधे छद्म व्यवस्था के क्रूर चेहरों से टकराने लगी।हिन्दी कविता में इस ‘विद्रोही और व्यवस्था-विरोधी’ तेवर को जिन दो सबसे प्रखर और प्रतिनिधि कवियों ने स्वर दिया,वे हैं- सुदामा पांडेय’धूमिल’और गोरख पाण्डेय। जब अंग्रेजी हुकूमत से देश मुक्ति मिलने के बाद भारतीयों ने जिस प्रकार के आजादी के स्वप्न देखे थे,देश की दशा लगभग उसके विपरीत ही हो रही थी।जिनके कारणों में तत्कालीन नेहरुवादी समाजवाद का ढाँचा,मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीतियों और देशी शासकों,पूँजीपतियों और समांतवादियों की शोषक नीतियों के कारण देश की जनता की निर्धनता,भूमिहीनता और सरकार की नीतियों के कारण ही भुखमरी जैसी समस्याओं के उत्पन्न होने से जनता में व्यापक असंतोष उत्पन्न हो गया, जिसके समाधान में सरकार पूरी तरह अक्षम साबित हो गई। |
| Keywords | जनवाद,क्रांति,आजादी,वर्ग-संघर्ष,मोहभंग,किसान,सर्वहारा,समकालीन कविता,सामंतवाद,नक्सलबाड़ी |
| Subject Area | Hindi |
| Issue | Volume 3, Issue 9 (September 2026) |
| Published | 2026/09/07 |
| How to Cite | दुर्गेश पाण्डेय एवं ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी (2026). ‘धूमिल’ और गोरख पाण्डेय के काव्य में नक्सलबाड़ी आंदोलन की गूँज: एक अनुशीलन. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(9), 13–20. |
| License |
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