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ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Papers - Volume - 3 Issue - 7 (July 2026)
Paper Title

चन्द्रकांता की कहानियों में वृद्ध विमर्श

Author(s) बीरेन्द्र किस्कु.
Country India
Abstract

साहित्यकार का समय और समाज के प्रति प्रतिबद्ध होता है। साहित्य के केन्द्र में मनुष्य होने के कारण वह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों से प्रभावित होता है। एक लेखक को समय की सभी गतिविधियों से परिचित होना जरूरी है। साहित्य में मनुष्य के सभी वर्ग, वर्ण, धर्म आदि भिन्नताओं के बावजूद एक मानव रूप में एक सामाजिक प्राणी के रूप में ही अवस्थित होता है। रचनाकार का वैयक्तिक जब सामाजिक संवेदनाओं, द्वद्वों से जुड़ जाता है तभी वह साहित्य बन पाता है। रचनाकार पूरे समाज से ही उन्मुख होता ळें साठोत्तरी कहानियों में कई विमर्श आये। प्रेमचंदोत्तर युगीन में जहाँ कथा साहित्य अपने प्रौढ़ स्थिति को पहुँची। वहीं साठोत्तरी में रचनाकारों ने समाज के विभिन्न वर्गों को अपनो कथा साहित्य का आधार बनाना शुरु किया। दलित विमर्ष, स्त्री विमर्श के साथ अब वृद्ध विमर्श पर कथा कहानियाँ रची जाने लगी। वृद्ध विमर्श पर उषा प्रियंवदा, भीष्म साहनी तथा चन्द्रकांता जैसे कहानीकार हुए। हम यहाँ विशेषकर चन्द्रकांता के कहानियों के माध्यम वृद्ध मनोविज्ञान की गहरी पड़ताल करेंगे तथा आधुनिक युग में वृद्धों के जीवन में आर्ह समस्याओं एवं उनके कारणों पर भी चर्चा करेंगे।

Subject Area Hindi
Issue Volume 3, Issue 5 (May 2026)
Published 2026/05/30
How to Cite बीरेन्द्र किस्कु (2026). चन्द्रकांता की कहानियों में वृद्ध विमर्श. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(5), 380–386. https://doi.org/10.70558/SPIJSH.2026.v3.i5.45766
DOI 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i5.45766

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