मौन और स्वर की राजनीति: ईस्टरिन किरे के कथा-साहित्य और आओ जनजाति की मौखिक परम्परा में लैंगिक अभिव्यक्ति का तुलनात्मक अध्ययन

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

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A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 5 (May 2026)

DOI: 10.70558/SPIJSH

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Article Title

मौन और स्वर की राजनीति: ईस्टरिन किरे के कथा-साहित्य और आओ जनजाति की मौखिक परम्परा में लैंगिक अभिव्यक्ति का तुलनात्मक अध्ययन

Author(s) बेनथंगलो एन जामी, डॉ. मुन्नी चौधरी.
Country India
Abstract

यह लेख ईस्टरीन किरे के साहित्यिक लेखन और नागालैंड, पूर्वोत्तर भारत की आओ नागा समुदाय की मौखिक‑सांस्कृतिक परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन करता है, जिसमें मौन और स्वर की लैंगिक संरचना पर विशेष ध्यान दिया गया है। उत्तर‑औपनिवेशिक स्त्रीवादी सिद्धांत विशेषकर गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक द्वारा उपवंचित (सबल्टर्न) वाणी की पड़ताल के आधार पर यह शोध यह विश्लेषण करता है कि किरे की महिला पात्र किस प्रकार सांस्कृतिक रूप से आरोपित मौन और उभरते आत्म‑अभिव्यक्ति के रूपों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। अओ नागा समुदाय की मौखिक परंपरा के संदर्भ में, जहाँ स्त्रियों की आवाज़ें लोककथाओं में संरक्षित भी हैं और पितृसत्तात्मक अनुष्ठानों द्वारा सीमित भी l इसलिए, यह लेख तर्क देता है कि साहित्यिक और मौखिक दोनों ही अभिलेख लैंगिक अभिव्यक्ति की जटिल राजनीति को उद्घाटित करते हैं। इन पाठों में मौन केवल अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि तनाव, प्रतिरोध और कभी‑कभी स्वायत्तता का परिप्रेक्ष्य है। तुलनात्मक रूपरेखा यह स्पष्ट करती है कि नागा साहित्यिक कल्पना में आदिवासी स्त्रियों की आवाज़ें लिखित और मौखिक दोनों माध्यमों में दमन और सृजनात्मक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजरती हैं।

Area Hindi
Issue Volume 3, Issue 5 (May 2026)
Published 2026/05/05
How to Cite ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(5), 16-23, DOI: https://doi.org/10.70558/SPIJSH.2026.v3.i5.45717.
DOI 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i5.45717

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