ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities

A Peer-Reviewed & Refereed International Multidisciplinary Monthly Journal

Call For Paper - Volume - 3 Issue - 6 (June 2026)
Article Title

हीर–राँझा की हरियाणवी रागणी परंपरा: पिंगल शास्त्र के आलोक में एक सांस्कृतिक विश्लेषण (रागणी 8–16 के संदर्भ में)

Author(s) आनन्द कुमार आशोधिया.
Country India
Abstract

यह शोध-पत्र हरियाणवी लोक-साहित्य की प्रमुख विधा ‘रागणी’ के माध्यम से हीर–राँझा कथा के मध्य एवं उत्तरार्ध (रागणी 8–16) का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि प्रेम, विरह, सामाजिक नियंत्रण तथा आध्यात्मिक रूपांतरण जैसी अवधारणाएँ रागणी परंपरा में किस प्रकार अभिव्यक्त होती हैं। यह शोध गुणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें पाठ-विश्लेषण के साथ पिंगल शास्त्र के छंद-विधान—विशेषतः मात्रा-संतुलन, यति और तुकांत योजना—का उपयोग किया गया है। साथ ही सांस्कृतिक अध्ययन और लोक-आख्यान के सैद्धांतिक दृष्टिकोणों के माध्यम से रचनाओं के सामाजिक एवं सांस्कृतिक अर्थों की व्याख्या की गई है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि रागणी 8–16 कथा के एक महत्वपूर्ण संक्रमण चरण का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहाँ प्रेम रोमांटिक आकर्षण से सामाजिक संघर्ष में परिवर्तित होकर अंततः विरह और वैराग्य की ओर अग्रसर होता है। हीर का जबरन विवाह, राँझा का विलाप और उसका जोगी रूप धारण करना व्यक्ति और समाज के बीच अंतर्विरोध को उजागर करते हैं। इस प्रक्रिया में पितृसत्तात्मक संरचना के अंतर्गत नारी की सीमित स्वतंत्रता भी स्पष्ट रूप से सामने आती है। यह शोध निष्कर्ष रूप में प्रतिपादित करता है कि हरियाणवी रागणी केवल मंचीय अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक आलोचना और मानवीय भावनाओं की गहन अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, जो क्षेत्रीय और सार्वभौमिक अनुभवों के बीच सेतु का कार्य करती है।

Area Humanities
Issue Volume 3, Issue 4 (April 2026)
Published 2026/04/16
How to Cite आनन्द कुमार आशोधिया (2026). हीर–राँझा की हरियाणवी रागणी परंपरा: पिंगल शास्त्र के आलोक में एक सांस्कृतिक विश्लेषण (रागणी 8–16 के संदर्भ में). ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(4), 154–159. https://doi.org/10.70558/SPIJSH.2026.v3.i4.45689
DOI 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i4.45689

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