| Paper Title | उत्तर प्रदेश में बाल भिक्षावृत्ति के उन्मूलन में राज्य एवं गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका: विधिक संरक्षण, बचाव एवं पुनर्वास व्यवस्था का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन |
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| Country | India |
| Abstract | बाल भिक्षावृत्ति भारत की एक गंभीर सामाजिक एवं विधिक समस्या है, जो बच्चों के गरिमापूर्ण जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास के अधिकार को प्रभावित करती है। गरीबी, बेरोजगारी, पारिवारिक अस्थिरता, अशिक्षा, सामाजिक बहिष्कार तथा बच्चों के शोषण जैसे अनेक कारण बाल भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह समस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बाल भिक्षावृत्ति के उन्मूलन के लिए केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि प्रभावी बचाव, संरक्षण और पुनर्वास की भी आवश्यकता है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश में बाल भिक्षावृत्ति की रोकथाम एवं उन्मूलन में राज्य तथा गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका का अनुभवजन्य अध्ययन करना है। अध्ययन में यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि संबंधित कानूनों एवं सरकारी योजनाओं का वास्तविक स्तर पर कितना प्रभावी क्रियान्वयन हो रहा है तथा बाल भिक्षुकों के बचाव और पुनर्वास में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएँ किस प्रकार कार्य कर रही हैं। शोध में बाल कल्याण समिति, पुलिस, जिला प्रशासन, बाल संरक्षण इकाइयों तथा गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका का भी अध्ययन किया जाएगा। साथ ही पुनर्वास के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार से पुनर्मिलन और सामाजिक पुनर्स्थापन जैसी व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किया जाएगा। अध्ययन का उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था की कमियों को पहचानकर बाल भिक्षावृत्ति के प्रभावी उन्मूलन एवं बच्चों के सम्मानजनक पुनर्वास के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत करना है। |
| Keywords | बाल भिक्षावृत्ति, बाल अधिकार, विधिक संरक्षण, राज्य की भूमिका, गैर-सरकारी संगठन, बचाव, पुनर्वास, उत्तर प्रदेश, अनुभवजन्य अध्ययन, सामाजिक न्याय। |
| Subject Area | Law |
| Issue | Volume 3, Issue 8 (August 2026) |
| Published | 2026/08/22 |
| How to Cite | रोहित सिंह यादव, & प्रेमचंद्र (2026). उत्तर प्रदेश में बाल भिक्षावृत्ति के उन्मूलन में राज्य एवं गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका: विधिक संरक्षण, बचाव एवं पुनर्वास व्यवस्था का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 3(8), 141–149. https://doi.org/10.70558/spijsh.2026.v3.i8.45890 |
| DOI | 10.70558/SPIJSH.2026.v3.i8.45890 |
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